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Updated: 2018-04-26T02:39:37.334-07:00

 



मंदिर मस्जिद विवाद से देश में कारपोरेट राज बहाल तो जाति युद्ध से जनसंख्या सफाये का मास्टर प्लान! पद्मावती विवाद का तो न कोई संदर्भ है और न प्रसंग। यह मुकम्मल मनुस्मृति राज का कारपोरेट महाभारत है।

2017-11-24T23:01:17.992-08:00

मंदिर मस्जिद विवाद से देश में कारपोरेट राज बहाल तो जाति युद्ध से जनसंख्या सफाये का मास्टर प्लान!पद्मावती विवाद का तो न कोई संदर्भ है और न प्रसंग।यह मुकम्मल मनुस्मृति राज का कारपोरेट महाभारत है।राजनीति,कारपोरेट वर्चस्व और मीडिया का त्रिशुल परमाणु बम से भी खतरनाक।सामाजिक तानाबाने को मजबूत किये बिना हम इस कारपोरेट राज का मुकाबला नहीं कर सकते।पलाश विश्वासमंदिर मस्जिद विवाद से देश में कारपोरेट राज बहाल तो जाति युद्ध से जनसंख्या सफाये का मास्टर प्लान है।पद्मावती विवाद का तो न कोई संदर्भ है और न प्रसंग।मंदिर मस्जिद विवाद के धारमिक ध्रूवीकरण से इस देश की अर्थव्यवस्था सिरे से बेदखल हो गयी और मुकम्मल कारपोरेट राज कायम हो गया।तो यह समझने की बात है कि पद्मावती विवाद से नये सिरे से जातियुद्ध छेड़ने के कारपोरेट हित क्या हो सकते हैं।यह देश व्यापी महाभारत भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को  सिरे से खत्म करने वाला है।यह मुकम्मल मनुस्मृति राज का कारपोरेट महाभारत है।यह जनसंख्या सफाये का मास्टर प्लान है।पद्मावती विवाद को लेकर जिस तरह जाति धर्म के नाम भारतीय जनमानस का ध्रूवीकरण हुआ है,वह भारत विभाजन की त्रासदी की निरंतरता है।जाति केंद्रित वैमनस्य और घृणा धर्मोन्माद से कहीं ज्यादा भयानक है,जो भारतीय समाज में मनुस्मृति विधान के संविधान और कानून के राज पर वर्चस्व का प्रमाण है।अफसोस यह है कि इस आत्मघाती जातियुद्ध का बौद्धिक नेतृत्व पढ़े लिखे प्रबुद्ध लोग कर रहे हैं तो दूसरी ओर बाबा साहेब भीमाराव अंबेडकर के स्वयंभू अनुयायी भी इस भयंकर जातियुद्ध की पैदल सेना के सिपाहसालर बनते दीख रहे हैं।मिथकों को समाज,राष्ट्र और सामाजिक यथार्थ,अर्थव्यवस्था और भारतीय नागरिकों की रोजमर्रे की जिंदगी और उससे जुड़े तमाम मसलों को सिरे से नजरअंदाज करके कारपोरेट राज की निरंकुश सत्[...]



सबकुछ निजी हैं तो धर्म और धर्मस्थल क्यों सार्वजनिक हैं?वहां राष्ट्र और राजनीति की भूमिका क्यों होनी चाहिए? किताबों,फिल्मों पर रोक लगाने के बजाये प्रतिबंधित हो सार्वजनिक धर्मस्थलों का निर्माण!जनहित में जब्त हो धर्मस्थलों का कालाधन! पलाश विश्वास

2017-11-21T20:38:46.938-08:00

सबकुछ निजी हैं तो धर्म और धर्मस्थल क्यों सार्वजनिक हैं?वहां राष्ट्र और राजनीति की भूमिका क्यों होनी चाहिए?किताबों,फिल्मों पर रोक लगाने के बजाये प्रतिबंधित हो सार्वजनिक धर्मस्थलों का निर्माण!जनहित में जब्त हो धर्मस्थलों का कालाधन!पलाश विश्वासhttps://www.youtube.com/watch?v=hdtbE2WerLIनिजीकरण का दौर है।आम जनता की बुनियादी जरुरतों और सेवाओं का सिरे से निजीकरण हो गया है।राष्ट्र और सरकार की कोई जिम्मेदारी नहीं है।तो धर्म अब भी सार्वजनिक क्यों है?गांव गांव धर्मस्थल के निर्माण के लिए विधायक सांसद कोटे से अनुदान देने की यह परंपरा सामंती पुनरूत्थान है।सत्ता हित के लिए धर्म का बेशर्म इस्तेमाल और बुनियादी जरुरतों और सेवाओं से नागरिकों को उनकी आस्था और धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ करते हुए वंचित करने की सत्ता संस्कृति पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। अर्थव्यवस्था जब निजी है तो धर्म का भी निजीकरण कर दिया जाये।निजी धर्मस्थल के अलावा सारे सार्वजनिक धर्मस्थल निषिद्ध कर दिये जायें और सार्वजनिक धर्मस्थलों की अकूत संपदा नागरिकों की बुनियादी जरुरतों के लिए खर्च किया जाये या कालाधन बतौर जब्त कर लिया जाये।नोटबंदी और जीएसटी से अर्थव्यवस्था जो पटरी पर नहीं आयी,धर्म कारोबारियों के कालाधन जब्त करने से वह सरपट दौड़ेगी।निजी दायरे से बाहर धर्म कर्म और सार्वजनिक धर्म स्थलों के निर्माण पर उसी तरह प्रतिबंध लगे जैसे हर सार्वजनिक चीज पर रोक लगी है।यकीन मानिये सारे वाद विवाद खत्म हो जायेंगे।व्यक्ति और उसकी आस्था,उसके धर्म के बीच राष्ट्र,राजनीति और सरकार का हस्तक्षेप बंद हो जाये तो दंगे फसाद की कोई गुंजाइस नहीं रहती।वैदिकी सभ्यता में भी तपस्या,साधना व्यक्ति की ही उपक्रम था,सामूहिक और सार्वजनिक धर्म कर्म का प्रदर्शन नहीं।मन चंगा तो कठौती में गंगा,संत रैदास कह गये हैं।भारत का भक्ति आंदो[...]



खोज रहा हूं खोया हुआ गांव,मैदान,पहाड़,अपना खेत।अपनी माटी। पलाश विश्वास

2017-11-20T22:58:34.866-08:00

खोज रहा हूं खोया हुआ गांव,मैदान,पहाड़,अपना खेत।अपनी माटी।पलाश विश्वासhttps://www.facebook.com/palashbiswaskl/videos/vb.100000552551326/1919932074701859/?type=2&theaterखोज रहा हूं खोया हुआ गांव,मैदान,पहाड़,अपना खेत।अपनी माटी।बाजार का कोई सिरा नजर नहीं आाता,न नजर आता कोई घर।किसी और आकाशगंगा के किसी और ग्रह में जैसे कोई परग्रही।सारे चेहरे कारपोरेट हैं।गांव,देहात,खेत खलिहान,पेड़ पहाड़ सबकुछइस वक्त कारपोरेट।भाषा भी कारपोरेट।बोलियां भी कारपोरेट।सिर्फ बची है पहचान।धर्म,नस्ल,भाषा,जाति की दीवारें कारपोरेट।कारपोरेट हित से बढ़कर न मनुष्य है और न देश,न यह पृथ्वी।गायें भैंसें और बैल न घरों में हैं और न खेतों में- न कहीं गोबर हैऔर न माटी कहीं है।कड़कती हुई सर्दी है,अलाव नहीं है कहीं और न कहीं आग है और न कोई चिनगारी।संवाद नहीं है,राजनीति है बहुत।उससे कहीं ज्यादा है धर्मस्थल,उनसे भी ज्यादा रंग बिरंगे जिहादी।महानगर का रेसकोर्स बन गया गांव इस कुहासे में,पर घोड़े कहींदीख नहीं रहे।टापों की गूंज दिशा दिशा में,अंधेरा घनघोर और लापता सारे घुड़सवार।नीलामी की बोली घोड़े की टाप।पसीने की महक कहीं नहीं है और सारे शब्द निःशब्द।फतवे गूंजते अनवरत।वैदिकी मंत्रोच्चार की तरह।न किसी का सर सलामत है और नाक सुरक्षित किसी की।हवाओं मेंतलवारें चमक रहीं है।सारे के सारे लोग जख्मी,लहुलुहान।लावारिश।घृणा का घना समुंदर कुहासे से भी घना है और है चूंती हुई नकदी का अहंकार। सबकुछ निजी है और सार्वजनिक कुछ भी नहीं।सिर्फ रोज रोज बनते युद्ध के नये मोर्चे जैसे अनंत धर्मस्थल।सारे महामहिम, आदरणीय विद्वतजन बेहद धार्मिक है इन दिनों।धर्म बचा है और क्या है वह धर्म भी,जिसका ईश्वर है अपना ब्रांडेड और जिसमें मनुष्यता की को कोई सुगंध नहीं।कास्मेटिक धर्म की कास्मेटिक सुगंध में मनुष्यता निष्णात।बचा है पुरोहिततंत्र।सारा इतिहास सि[...]



शंबूक हत्या,सीता की अग्निपरीक्षा और उनका वनवास,उत्तर कांड हटाकर रामजी का शुद्धिकरण जनविमर्श का जन आंदोलनः साहित्य,कला,माध्यम,विधाओं को सत्ता के शिकंजे से रिहा कराना सत्ता परिवर्तन से बड़ी चुनौती है जो सभ्यता और मनुष्यता के लिए अनिवार्य है। पलाश विश्वास

2017-10-03T01:34:27.486-07:00

शंबूक हत्या,सीता की अग्निपरीक्षा और उनका वनवास,उत्तर कांड हटाकर रामजी का शुद्धिकरण जनविमर्श का जन आंदोलनः साहित्य,कला,माध्यम,विधाओं को सत्ता के शिकंजे से रिहा कराना सत्ता परिवर्तन से बड़ी चुनौती है जो सभ्यता और मनुष्यता के लिए अनिवार्य है।पलाश विश्वासमिथकों को इतिहास में बदलने का अभियान तेज हो गया है।साहित्य और संस्कृति कीसमूची विरासत को खत्म करने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खत्म है और सारे के सारे मंच,माध्यम और विधाएं बेदखल है।मर्यादा पुरुषोत्तम को राष्ट्रीयता का प्रतीक बनाने वाली राजनीति अब मर्यादा पुरुषोतत्म के राम का भी नये सिरे से कायाकल्प करने जा रही है।शंबूक हत्या,सीता की अग्निपरीक्षा और उनका वनवास,उत्तर कांड हटाकर रामजी का शुद्धिकरण किया जा रहा है।बंगाल या बांग्लादेश में रवींद्र के खिलाफ घृणा अभियान का जबर्दस्त विरोध है।स्त्री स्वतंत्रता में पितृसत्ता के विरुद्ध रवींद्र संगीत और रवींदार साहित्य बंगाल में स्त्रियों और उनके बच्चों के वजूद में पीढ़ी दर पीढ़ी शामिल हैं।लेकिन विद्यासागर,राममोहन राय और माइकेल मधुसूदन दत्त के खिलाफ जिहाद का असर घना है।राम लक्ष्मण को खलनायक और मेघनाद को नायक बनाकर माइकेल मधुसूदन दत्त का  मुक्तक (अमृताक्षर) छंद में लिखा उन्नीसवीं सदी का मेघनाथ बध काव्य विद्यासागर और नवजागरण से जुड़ा है और आधुनिक भारतीय कविता की धरोहर है।जब रामायण संशोधित किया जा सकता है तो समझ जा सकता है कि मेघनाथ वध जैसे काव्य और मिथकों के विरुद्ध लिखे गये बारतीय साहित्य का क्या हश्र होना है।इस सिलसिले में उर्मिला और राम की शक्ति पूजा को भी संशोदित किया जा सकता है।इतिहास संशोधन के तहत रवींद्र प्रेमचंद्र गालिब पाश मुगल पठान और विविधता बहुलता सहिष्णुता के सारे प्रतीक खत्म करने के अभियान के त[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-33 वंदेमातरम् की मातृभूमि अब विशुद्ध पितृभूमि है। जहां काबूलीवाला जैसा पिता कोई नहीं है। काबूलीवाला,मुसलमानीर गल्पो और आजाद भारत में मुसलमान रवींद्रनाथ की कहानियों में सतह से उठती मनुष्यता का सामाजिक यथार्थ,भाववाद या आध्यात्म नहीं! आजाद निरंकुश हिंदू राष्ट्र का यह धर्मोन्माद भारत के किसानों ,आदिवासियों,स्त्रियों और दलितों के खिलाफ है,इसे हम सिर्फ मुसल�

2017-09-23T22:36:24.301-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-33वंदेमातरम् की मातृभूमि अब विशुद्ध पितृभूमि है।जहां काबूलीवाला जैसा पिता कोई नहीं है।काबूलीवाला,मुसलमानीर गल्पो और आजाद भारत में मुसलमानरवींद्रनाथ की कहानियों में सतह से उठती मनुष्यता का सामाजिक यथार्थ,भाववाद या आध्यात्म नहीं!आजाद निरंकुश हिंदू राष्ट्र का यह धर्मोन्माद भारत के किसानों ,आदिवासियों,स्त्रियों और दलितों के खिलाफ है,इसे हम सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ समझने की भूल कर रहे हैं।पलाश विश्वासरवींद्रनाथ की कहानियों में सतह से उठती सार्वभौम मनुष्यता का सामाजिक यथार्थ है।विषमता की पितृसत्ता का प्रतिरोध है।अन्य विधाओं में लगभग अनुपस्थित वस्तुवादी दृष्टिकोण है।मनुस्मृति के खिलाफ,सामाजिक विषमता के खिलाफ,नस्ली वर्चस्व के खिलाफ अंत्यज,बहिस्कृतों की जीवनयंत्रणा का चीत्कार है।कुचली हुई स्त्री अस्मिता का खुल्ला विद्रोह है।न्याय और समानता के लिए संघर्ष की साझा विरासत है।रवींद्रनाथ की गीताजंलि,उनकी कविताओं,उनकी नृत्य नाटिकाओं,नाटकों और उपन्यासों में भक्ति आंदोलन,सूफी संत वैष्णव बाउल फकीर गुरु परंपरा के असर और इन रचनाओं पर वैदिकी,अनार्य,द्रविड़,बौद्ध साहित्य और इतिहास,रवींद्र के आध्यात्म और उनके भाववाद के साथ उनकी वैज्ञानिक दृष्टि की हम सिलसिलेवार चर्चा करते रहे हैं।इन विधाओं के विपरीत अपनी कहानियों में रवींद्रनाथ का सामाजिक यथार्थ भाववाद और आध्यात्म के बजाय वस्तुवादी दृष्टिकोण से अभिव्यक्त है।इसलिए उनकी कहानियां ज्यादा असरदार हैं।आज हम रोहिंगा मुसलमानों को भारत से खदेड़ने के प्रयास के संदर्भ में आजाद भारत में मुसलमानों की स्थिति समझने के लिए उनकी दो कहानियों काबूलीवाल और मुसलमानीर गल्पो की चर्चा करेंगे।इन दोनों कहानियों में मनुष्यता के धर्म की साझा विर[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-32 देवी नहीं है,कहीं कोई देवी नहीं है। विसर्जनःदेवता के नाम मनुष्यता खोता मनुष्य দেবতার নামে মনুষ্যত্ব হারায় মানুষ पलाश विश्वास

2017-09-22T01:37:19.932-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-32देवी नहीं है,कहीं कोई देवी नहीं है।विसर्जनःदेवता के नाम मनुष्यता खोता मनुष्यদেবতার নামেমনুষ্যত্ব হারায় মানুষपलाश विश्वासवैसे भी धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की सुनामी के मध्य मनुस्मृति विरोधी रवींद्र के दलित विमर्श को जारी रखने में भारी कठिनाई हो रही।रवींद्र के दलित विमर्श और उससे संदर्भ सामग्री शेयर करने पर बार बार रोक लग रही है।दैवी सत्ता और राजसत्ता के देवी पक्ष में देवी के अस्तित्व से इंकार के नाटक विसर्जन की चर्चा इस अंध धर्मोन्माद के महिषासुर वध उत्सव के मध्य बेहद मुश्किल है लेकिन जरुरी भी है सत्ता ने वर्ग वर्ण नस्ली तिलिस्म को तोड़ने के लिए।रवींद्र नाथ ने राष्ट्रवाद के विरुद्ध त्रिपुरा राजपरिवार को लेकर राजर्षि उपन्यास लिखा,जिसका प्रकाशन 1889 में हुआ।फिर उन्होंने इसी उपन्यास के पहले अंश को लेकर विसर्जन नाटक लिखा,जो 1890 में प्रकाशित हुआ। राष्ट्रवाद के नाम अंध धर्मोन्माद के खिलाफ यह नाटक है जिसमें बलि प्रथा का विरोध है और देवी के अस्तित्व से सिरे से इंकार है।जयसिंह के आत्म बलिदान की कथा भी यह है.जो सत्य,अहिंसा और प्रेम की मनुष्यता का उत्कर्ष है।धर्म और आस्था से बड़ी है मनुष्यता और वही विश्वमानव जयसिंह है।रवींद्रनाथ ने सीधे कह दिया हैःदेवी नहीं है,कही कोई देवी नहीं है।सिर्फ विसर्जन नाटक ही नहीं,रवींद्रनाथ ने विसर्जन शीर्षक से गंगासागर तीर्त यात्रा के दौरान पुरोहित के उकसावे पर देवता के रोष से बचने के लिए तीर्थ यात्रियों के अंध विश्वास के कारण एक विधवा के इकलौते बेटे को गंगा में विसर्जन की कथा अपनी कविता देवतार ग्रास में लिखी है।इस नाटक में दैवी सत्ता  राजसत्ता के साधन बतौर प्रस्तुत है। अंध धर्मोन्माद की सत्ता की राजनीति बेनकाब है इसमें,जो आज का सच है।आम जनता में[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-31 बांग्लादेश में रवींद्र और शरत को पाठ्यक्रम से बाहर निकालने के इस्लामी राष्ट्रवाद खिलाफ आंदोलन तेज हमारे यहां शिक्षा और इतिहास के हिंदुत्वकरण के खिलाफ सन्नाटा कट्टरपंथ के खिलाफ आसान नहीं होती लड़ाई। श्वेत आंतकवाद के युद्धस्थल वधस्थल बन गये भारत,पाकिस्तान और बांग्लादेश, हालांकि रंग श्वेत दीखता नहीं है पलाश विश्वास

2017-09-21T07:13:03.242-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-31बांग्लादेश में रवींद्र और शरत को पाठ्यक्रम से बाहर निकालने के इस्लामी राष्ट्रवाद खिलाफ आंदोलन तेजहमारे यहां शिक्षा और इतिहास के हिंदुत्वकरण के खिलाफ सन्नाटाकट्टरपंथ के खिलाफ आसान नहीं होती लड़ाई।श्वेत आंतकवाद के युद्धस्थल वधस्थल बन गये भारत,पाकिस्तान और बांग्लादेश, हालांकि रंग श्वेत दीखता नहीं हैपलाश विश्वासकट्टरपंथ के खिलाफ आसान नहीं होती कोई लड़ाई।लालन फकीर और रवींद्रनाथ की रचनाओं को पाठ्यक्रम से निकालने के खिलाफ बांग्लादेश में आंदोलन तेज हो रहा है और रवींद्र और प्रेमचंद समेत तमाम साहित्यकारों को पाठ्यक्रम से निकालने और समूचा इतिहास को वैदिकी साहित्य में बदलने  के खिलाफ भारत में अभी कोई आंदोलन शुरु नहीं किया जा सका है।बांग्लादेश में पाकिस्तानी शासन के दौरान 1961 में भी रवींद्र साहित्य और रवींद्रसंगीत पर हुक्मरान ने रोक लगा दी थी,जिसका तीव्र विरोध हुआ और वह रोक हटानी पड़ी।बाग्लादेश मुक्तिसंग्राम के दौरान तो रवींद्र के लिखे गीत आमार सोनार बांग्ला आमि तोमाय भोलोबासि  बांग्लादेश का राष्ट्रीय संगीत बन गया।गौरतलब है कि 1961 के प्रतिबंध के खिलाफ ढाका में बांग्ला नववर्ष और 25 बैशाख को रवींद्र जयंती मनाने का सिलसिला शुरु हुआ जो कभी रुका नहीं है।विविधता,बहुलता,सहिष्णुता के लोकतंत्र के खिलाफ हैं भारत के हिंदू राष्ट्रवादी और बांग्लादेश के इसलामी राष्ट्रवादी दोनों।जिस तरह संघ परिवार शिक्षा व्यवस्था के आमूल हिंदुत्वकरण के लिए लगातार विश्वविद्यालयों पर हमले कर रहा है,पाकिस्तान बनने के बाद और पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने के बाद वहां भी विश्विद्यालय कट्टर इस्लामी राष्ट्रवादियों  के निशाने पर हैं।रवींद्रनाथ कहते थे कि पश्चिम के ज्ञान विज्ञान वहा[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-30 गंगा और नर्मदा की मुक्तधारा को अवरुद्ध करने वाली दैवीसत्ता का फासिज्म आदिवासियों और किसानों के खिलाफ सामाजिक विषमता के खिलाफ मनुस्मृतिविरोधी लड़ाई को खत्म करना ही हिंदुत्ववादियों के हिंदू राष्ट्र का एजंडा मुक्तधारा के लिए जल सत्याग्रह इसीलिए जारी रहेगा। पलाश विश्वास

2017-09-20T10:01:54.080-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-30गंगा और नर्मदा की मुक्तधारा को अवरुद्ध करने वाली दैवीसत्ता का फासिज्म आदिवासियों और किसानों के खिलाफसामाजिक विषमता के खिलाफ मनुस्मृतिविरोधी लड़ाई को खत्म करना ही हिंदुत्ववादियों के हिंदू राष्ट्र का एजंडामुक्तधारा के लिए जल सत्याग्रह इसीलिए जारी रहेगा।पलाश विश्वासटिहरी बांध का उतना प्रबल विरोध नहीं हुआ और गंगा की अबाध जलधारा हमेशा के लिए नमामि गंगा के मंत्रोच्चार के बीच अवरुद्ध कर दी गयी।पुरानी टिहरी समेत उत्तरकाशी और टिहरी की खूबसूरत घाटियां डूब में शामिल हो गयीं।अपने खेतों,अपने गांवों और आजीविका के लिए जरुरी जंगल से बेदखल मनुष्यों का पुनर्वास नहीं हुआ अभीतक।कांग्रेसी राजकाज के जमाने में सोवियत सहयोग से बने इस बांध के विरोध में व्यापक जन आंदोलन नहीं हो सका क्योंकि तब पहाड़ में शक्तिशाली वाम दलों और संगठनों ने सोवियत पूजी का विरोध नहीं किया।उत्तराखंड अलग राज्य के लिए आंदोलन करने वाले लोगों ने भी टिहरी बांध का विरोध नहीं किया।पर्यावरण कार्यकर्ताओं,चिपको और सर्वोदय आंदोलन के मंच से हालांकि इस बांध परियोजना का जोरदार विरोध किया जाता रहा है।इससे पहले दामोदर वैली,हिराकुड,रिंहद और भाखड़ा समेत तमाम बड़े बांधों का विकास,बिजली और सिंचाई के लिए अनिवार्य मान लिया गया।इन बांधों के कारण जल जंगल जमीन से बेदखल आदिवासियों और किसानों का आजतक पुनर्वास नहीं हो सका है।विकास परियोजनाओं में विस्थापितों का पुनर्वास कभी नहीं हुआ है और इस विकास के बलि होते रहे हैं आदिवासी और किसान।मुक्तधारा के लिए जल सत्याग्रह इसीलिए जारी रहेगा।इस तुलना में नर्मदा बांध का विरोध सिलसिलेवार होता रहा है और कुड़नकुलम परमाणु संयंत्र का भी विरोध जोरदार रहा है।कुड़नकुलम परम[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-29 हिंदू राष्ट्र सिर्फ संघ परिवार का कार्यक्रम नहीं है। मनुस्मृति विधान बहाली की सत्ता वर्ग और वर्ण की सारी ताकतें ईस्ट इंडिया कंपनी के राज के समय से सक्रिय हैं। चैतन्य महाप्रभू के वैष्णव आंदोलन से लेकर ब्रहम समाज आंदोलन,नवजागरण और सूफी संत आंदोलन के खिलाफ हिंदुत्व का पुनरूत्थान एक अटूट सिलसिला है।फर्क इतना है कि तब एकमात्र ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था और अ�

2017-09-19T02:52:18.638-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-29हिंदू राष्ट्र सिर्फ संघ परिवार का कार्यक्रम नहीं है।मनुस्मृति विधान बहाली की सत्ता वर्ग और वर्ण की सारी ताकतें ईस्ट इंडिया कंपनी के राज के समय से सक्रिय हैं।चैतन्य महाप्रभू के वैष्णव आंदोलन से लेकर ब्रहम समाज आंदोलन,नवजागरण और सूफी संत आंदोलन के खिलाफ हिंदुत्व का पुनरूत्थान एक अटूट सिलसिला है।फर्क इतना है कि तब एकमात्र ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था और अब डिजिटल इंडिया में हजारों ईस्ट इंडिया कंपनियों का राज है।1980 के दशक से या फिर 1970 के दशक नक्सलसमय के दौरान दक्षिण पंथी ताकतों के ध्रूवीकरण से सिर्फ सत्ता समीकरण बदला है,कोई नई शुरुआत नहीं हुई है।बौद्धमय भारत के अंत के बाद ब्राह्मण धर्म के मनुस्मृति विधान की बहाली के लिए हिंदुत्व का पुनरूत्थान एक अटूट सिलसिला है,इसे समझे बिना नस्ली वर्चस्व के नरसंहारी राष्ट्रवाद का प्रतिरोध असंभव है।रवींद्र का दलित विमर्श औपनिवेशिक भारत में हिंदुत्व के उसी पुनरूत्थान के प्रतिरोध में है।पलाश विश्वासबौद्धमय भारत के अंत के बाद ब्राह्मण धर्म के मनुस्मृति विधान की बहाली के लिए हिंदुत्व का पुनरूत्थान एक अटूट सिलसिला है,इसे समझे बिना नस्ली वर्चस्व के नरसंहारी राष्ट्रवाद का प्रतिरोध असंभव है।रवींद्र का दलित विमर्श औपनिवेशिक भारत में हिंदुत्व के उसी पुनरूत्थान के प्रतिरोध में है।14 मई के बाद हमारी दुनिया सिरे से बदल गयी है और इससे पहले भारत में नस्ली अंध राष्ट्रवाद जैसा कुछ नहीं था या सत्ता समीकरण के सोशल इंजीनियरिंग से मनुस्मृति शासन का अंत हो जायेगा और समता और न्याय का भारततीर्थ का पुनर्जन्म होगा,ऐसा मानकर जो लोग नस्ली विषमता,घृणा, हिंसा और नरसंहार संस्कृति की मौजूदा व्यवस्था बदलने का ख्वाब देखते हैं,उनक[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-28 अंधेर नगरी में सत्यानाश फौजदार का राजकाज! जहाँ न धर्म न बुद्धि नहिं, नीति न सुजन समाज। ते ऐसहि आपुहि नसे, जैसे चौपटराज॥ रवींद्र प्रेमचंद के बाद निशाने पर भारतेंदु? क्या वैदिकी सभ्यता का प्रतीक न होने की वजह से अशोक चक्र को भी हटा देंगे? बंगाल में महिषासुर उत्सव की धूम से नस्ली वर्चस्व के झंडेवरदारों में खलबली हिटलर की नाजी सेना और रवींद्रनाथ के ताशेर घर की अ�

2017-09-18T11:52:54.832-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-28अंधेर नगरी में सत्यानाश फौजदार का राजकाज!जहाँ न धर्म न बुद्धि नहिं, नीति न सुजन समाज।ते ऐसहि आपुहि नसे, जैसे चौपटराज॥रवींद्र प्रेमचंद के बाद निशाने पर भारतेंदु? क्या वैदिकी सभ्यता का प्रतीक न होने की वजह से अशोक चक्र को भी हटा देंगे?बंगाल में महिषासुर उत्सव की धूम से नस्ली वर्चस्व के झंडेवरदारों में खलबलीहिटलर की नाजी सेना और रवींद्रनाथ के ताशेर घर की अंत्यज आम अस्पृश्य जनता की पैदल फौजों के दम पर वर्तमान पर कब्जा कर लेने के बाद फासिस्टों के निशाने पर है अतीत और भविष्य,जिन्हें वैदिकी साहित्य और मनुस्मृति विधान के मुताबिक सबकुछ संशोधित करने का अश्वमेध अभियान जारी है।पलाश विश्वासडिजिटल इंडिया में इन दिनों जो वेदों,उपनिषदों,पुराणों,स्मृतियों,महाकाव्यों के वैदिकी साहित्य में लिखा है,सिर्फ वही सच है और बाकी भारतीय इतिहास,हड़प्पा मोहंजोदोड़ो सिंधु घाटी की सभ्यता, अनार्य द्रविड़ शक हुण कुषाण खस पठान मुगल कालीन साहित्य, आख्यान, वृत्तांत और विमर्श झूठ हैं।ब्राह्मण धर्म और मनुस्मृति विधान सच हैं और महात्मा गौतम बुद्ध,उनका धम्म,महात्मा महावीर,गुरु नानक,बसेश्वर,ब्रह्म समाज,नवजागरण,सूफी संत बाउल फकीर आंदोलन झूठ हैं।हिटलर की नाजी सेना और रवींद्रनाथ के ताशेर घर की अंत्यज आम अस्पृश्य जनता की पैदल फौजों के दम पर वर्तमान पर कब्जा कर लेने के बाद फासिस्टों के निशाने पर है अतीत और भविष्य,जिन्हें वैदिकी साहित्य और मनुस्मृति विधान के मुताबिक सबकुछ संशोधित करने का अश्वमेध अभियान जारी है।इस हिसाब से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास और भारतीय संविधान और अब तक चला आ रहा कायदा कानून,नागरिक और मानवाधिकार का सफाया तय है तो रवींद्रनाथ,गालिब, प[...]



Racist fascism would ban Ashoka Chakra soner or later as it does not represent Vedic History or religion! Bengal celebrates Mahishasur Utsav at large level and RSS opposes as it has been trying to brand JNU anti national for Adivasi Bahujan narrative of the destruction of Non Aryan aborigine civilization in India! Anti Adivasi Anti Dalit Anti OBC patriarchal Manusmriti hegemony of blind racist nationalism would soon launch campaign against everything which is not vedic.It is dark digital age of blue whales Killing the idea of India. Palash Biswas

2017-09-18T03:16:23.697-07:00

Racist fascism would ban Ashoka Chakra soner or later as it does not represent Vedic History or religion!Bengal celebrates Mahishasur Utsav at large level and RSS opposes as it has been trying to brand JNU anti national for Adivasi Bahujan narrative of the destruction of Non Aryan aborigine civilization in India!Anti Adivasi Anti Dalit Anti OBC patriarchal Manusmriti hegemony of blind racist nationalism would soon launch campaign against everything which is not vedic.It is dark digital age of blue whales Killing the idea of India.Palash BiswasBengali dail Ei Samay has reported on front page today about Mahishasur Utsav celebrated by Indian aborigine Adivasi people and Dalit Bahujan Amebdkarite people.In Bengal the celbration this year is much organized thanks to Dalit Solidarit Network and Mulnivasi samiti and the people and activists like Saradindu Uddipan,Pijus Pijush Kanti Gayen,David Das,Charan Besra supported by trible people in Bihar,Jharkhand,Orissa and Bengal.Mass celebration of Mahishasur Utasav by Bahujan Peasantry of Adivasi Peasant Dalit OBC and Muslim communities in Bengal has been noticed by mainstream media.However,the caste Hindu intelligentsia in Bengal led by Vedic specialists like Nrisingh Bhaduri is dismissed as the Adivasi and Dalit narrative of Asur Anarya civilization destroyed by Aryans with Mythical Durga is not endorsed by Vedic literature.Anthropologist Pashupati Mahato argues that the Aborigine Adivasi Dalit Bahujan narrative of their plight and their suordination to Arya Brahaminical hegemonial Manusmriti rule should not be included in Vedic literature and it has nothing to do with the credential of such narrative.Dalit solidarty Network cordinater Saradindu Uddipan has clarified that Mahishasur Utsav has nothing to do with Durgotasav.It is not communal or cultural clash at all.In fact,it is the continuity of Bahujan folk heritage of Buddhist Baul Vaisnav Bengal of diversity,plurality and fraternity with the history of Baul Faqir Vaisnav Budhhist Jain Sufi combined Bahujan history of Bengal represented by Lalon Fakir,Chaitanya Mahaprabhu,Brahmo Samaj,Bengal Renaissance Peasantry uprisings, ramkrishna,Vivekanand, Rabindra Nath Tagore and Kazi Nazrul Islam.Nevertheless, RSS is opposing the Mahishasur Utsav as it has been celebrated for years and Bengali people had no objection against tribal and Bahujan narrative and their celebration of life.But RSS is trying its best to make it an issue for religious communal political polarization as it has already tried to brand antinational JNU for Mahishasur Narrative.After Rabindra Nath and muslim period of Indian history and icons like Galib and others from the heritage of unity in diversity in India,the fascism of intolerance and apartheidd has excluded the most prminent Hindi writer Premchand.Bharatendu Harishchandraa wrote Vedic Hinsa Hinsa Na Bhavati,Bharat Durdasha and Andher Nagri Chaupat Raj which might also be branded as ant national sooner or later.Ashok Chakra might be excluded as it does not represent Vedic history and culture.Anti Adivasi Anti Dalit Anti OBC patriarchal Manusmriti hegemony of blind racist nationalism would soon launch campaign against everything which is not vedic.It is dark digital age of blue whales Killing the idea of India.I am addressing these issues in my discourse on Ravindras roots in Bahujan movement led by Adivasi



रवींद्र का दलित विमर्श-27 ताशेर देशःमनुस्मृति व्यवस्था के फासीवाद पर तीखा प्रहार नर्मदा बांध विरोधी आंदोलन के खिलाफ दैवी सत्ता का आवाहन ,हिटलर की आर्य विशुद्धता का सिद्धांत और नरहसंहार कार्यक्रम पलाश विश्वास

2017-09-17T10:41:50.471-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-27ताशेर देशःमनुस्मृति व्यवस्था  के फासीवाद पर तीखा प्रहारनर्मदा बांध विरोधी आंदोलन के खिलाफ दैवी सत्ता का आवाहन ,हिटलर की आर्य विशुद्धता का सिद्धांत और नरहसंहार कार्यक्रमपलाश विश्वासनर्मदा बांध के खिलाफ आदिवासियों और किसानों के आंदोलन का दमन का सिलसिला जारी रखते हुए आज इसे देश के नाम समर्पित करते हुए दावा किया गया कि इसके निर्माण में विदेशी कर्ज की जगह मंदिरों के धन का इस्तेमाल किया गया है।यह दावा किसान आदिवासी विरोधी नर्मदा घाटी की पूरी आबादी को डूब में शामिल करने वाले इस विध्वंसक निर्माण कार्य को धर्म और धर्म स्थल से जोड़ने का विशुद्ध धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का आवाहन है जिसके तहत प्रकृति और मनुष्यविरोधी इस बड़े बांध के निर्माण का विरोध करने वालों को जनमानस में राष्ट्रद्रोही बनाया जा सके।हमने रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या और उनके मानवाधिकार हनन को समर्थन करने के पश्चिमी धर्मयुद्ध से जनमे राष्ट्रवाद की चर्चा करते हुए राजसत्ता के दैवीसत्ता में बदल  जाने की चर्चा की है।नर्मदा बांध में इसी दैवी सत्ता का आवाहन किया जा रहा है।रवींद्र नाथ के तासेर घर की फंतासी को रवींद्र के अंध राष्ट्रवाद के विरोध के मद्देनजर फासीवाद के विरोध के रुप में देखा जाता है।विचारधारा के तहत मनुष्यों को अनुशासित सैन्यदल या ताश के पत्तों में बदल देने की फासिस्ट राष्ट्रवाद के खिलाफ यह प्रतिरोध है।हम मजहबी राजनीति में इस तरह जनसमुदायों को वोटबैंक राजनीति के तहत कार्ड और ट्रंप कार्ड में तब्दील होते देख रहे हैं।इस सिलसिले में हम ओबीसी ट्रंप कार्ड की चर्चा करते रहे हैं तो दलित और मुसलमान ट्रंप कार्डों का चलन शुरु से हो रहा है।आज भी ह[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-26 राजसत्ता धर्म सत्ता में तब्दील यूरोप का मध्यकालीन बर्बर धर्मयुद्ध भारत के वर्तमान और भविष्य का सामाजिक यथार्थ। राजसत्ता,धर्मसत्ता,राष्ट्रवाद और शरणार्थी समस्या के संदर्भ में रोहिंग्या मुसलमान और गुलामी की विरासत पलाश विश्वास

2017-09-16T06:07:54.039-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-26राजसत्ता धर्म सत्ता में तब्दीलयूरोप का मध्यकालीन बर्बर धर्मयुद्ध भारत के वर्तमान और भविष्य का सामाजिक यथार्थ।राजसत्ता,धर्मसत्ता,राष्ट्रवाद और शरणार्थी समस्या के संदर्भ में रोहिंग्या मुसलमान और गुलामी की विरासतपलाश विश्वासकोलकाता में रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में लाखों मुसलमानों ने रैली की और इस रैली के बाद बंगाल में रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर नये सिरे से धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण तेज हुआ है।भारत में सिर्फ मुसलमान ही म्यांमार में नरसंहार और मानवाधिकार हनन के खिलाफ मुखर है,ऐसा नहीं है।पंजाब के गुरुद्वाराओं से सीमा पर जाकर सिख कार्यकर्ता बड़े पैमाने पर इन शरणार्थियों के लिए लंगर चला रहे हैं तो भारत के गैर मुसलमान नागरिकों का एक बड़ा हिस्सा भी रोहिंग्या नरसंहार के खिलाफ विश्वजनमत के साथ है।हिंदू मुसलमान दो राष्ट्र के सिद्धांत पर भारत विभाजन और जनसंंख्या स्थानांतरण भारत में शरणार्थी समस्या का मौलिक कारण है।धर्म आधारित राष्ट्रीयता की यह विरासत भारत की नहीं है।यूरोप के धर्म युद्ध की राष्ट्रीयता है और फिलीस्तीन विवाद को लेकर यूरोप का यह धर्म युद्ध अरब मुसलमान दुनिया के खिलाफ आज भी जारी है और इसी धर्म युद्ध के रक्तबीज बनकर तमाम आतंकवादी धर्म राष्ट्रीयता के संगठन रो दुनिया को लहूलुहान कर रहे हैं।धर्म आतंकवाद का पर्याय बन गया है।रोहिंगा मुसलमानों की समस्या भी राजसत्ता के धर्म सत्ता में बदल जाने की कथा है जिसके तहत एक धारिमिक राष्ट्रीयता दूसरी धार्मिक राष्ट्रीयता का सफाया करने में लगी है।अखंड भारत और म्यांमार दोनों ब्रिटिश हुकूमत के उपनिवेश रहे हैं तो यह धर्म युद्ध भी उसी औपनिवेशिक ग[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-25 विषमता की अस्पृश्यता के पुरोहित तंत्र के विरुद्ध समानता और न्याय की आवाज ही रवींद्र रचनाधर्मिता है। . ”এ দুর্ভাগা দেশ হতে হে মঙ্গলময় /দূর করে দাও তুমি সর্ব তুচ্ছ ভয়-/ লোক ভয়, রাজভয়, মৃত্যু ভয় আর/দীনপ্রাণ দুর্বলের এ পাষাণভার।'——- :: রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর धार्मिक राष्ट्रवाद के आधार पर देश का विभाजन हो गया धार्मिक पहचान की दो राष्ट्रीयताओं के सिद्धांत के तहत औ

2017-09-15T08:07:19.907-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-25विषमता की अस्पृश्यता  के पुरोहित तंत्र के विरुद्ध समानता और न्याय की आवाज ही रवींद्र रचनाधर्मिता है।. "এ দুর্ভাগা দেশ হতে হে মঙ্গলময় /দূর করে দাও তুমি সর্ব তুচ্ছ ভয়-/ লোক ভয়, রাজভয়, মৃত্যু ভয় আর/দীনপ্রাণ দুর্বলের এ পাষাণভার।'——- :: রবীন্দ্রনাথ ঠাকুরधार्मिक राष्ट्रवाद के आधार पर देश का विभाजन हो गया धार्मिक पहचान की दो राष्ट्रीयताओं के सिद्धांत के तहत और आज फिर उसी धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद से हम भारत को डिजिटल इंडिया बनाने की मुहिम में शामिल हैं।इसके विपरीत आस्था का  लोकतंत्र इस्लामी शासन से भी पहले बौद्ध,हिंदू और जैन भक्ति आंदोलन की साझा विरासत सातवीं आठवीं सदी से बनती रही है और 14 वीं सदी के बाद सूफी संत आंदोलन के साथ पूरे देश की लोक संस्कृति में बदल गया यह आस्था का लोकतंत्र और ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ भारतीय जनता के एकताबद्ध स्वतंत्रता संग्राम की जमीन भी यह है।यही हमारी साझा विरासत है।पलाश विश्वास विषमता की अस्पृश्यता  के पुरोहित तंत्र के विरुद्ध समानता और न्याय की आवाज ही रवींद्र रचनाधर्मिता है।इसीलिए उत्पीड़ित अपमानित मनुष्यता के लिए न्याय और समानता की उनकी मांग उनकी कविताओं,गीतों,उपन्यासों और कहानियों से लेकर गीताजंलि के सूफी बाउल आध्यात्म और रक्त करबी और चंडालिका जैसी नृत्य नाटिकाओं का मुख्य स्वर है।उनकी प्रार्थना अपने मोक्ष के लिए नहीं है यह जनगण की मुक्तिकामना हैःए दुर्भागा देश होते हे मंगलमयदूर करे दाओ तुमि सब तुच्छ भय,-लोकभय,राजभय,मृत्युभय आरदीन प्राणेर दुर्बलेर ए पाषाणभार,एर चिरपेषण यंत्रणा धुलितलेएई नित्य अवनति ,दण्डे पले पलेएई आत्म अवमान,अंतरे बाहिरेएई दासत्वेर [...]



रवींद्र का दलित विमर्श-24 भारत के दलित विमर्श में रवींद्र नाथ नहीं है और आदिवासी किसानों मेहनतकशों के हकहकूक की विरासत की लोकसंस्कृति वह जमीन नहीं है,इसीलिए भारत में मनुस्मृति नस्ली वर्चस्व के खिलाफ कोई प्रतिरोध नहीं है। भानूसिंहेर पदावली सीधे तौर पर बंगाल के बाउल फकीर बहुजन किसान आदिवासी सामंतवाद विरोधी साम्रजाय्वाद विरोधी आंदोलन को बदनाम गायपट्टी के दैवी सत्ता राजसत्ता वि�

2017-09-14T02:29:33.837-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-24भारत के दलित विमर्श में रवींद्र नाथ नहीं है और आदिवासी किसानों मेहनतकशों के हकहकूक की विरासत की लोकसंस्कृति वह जमीन नहीं है,इसीलिए भारत में मनुस्मृति नस्ली वर्चस्व के खिलाफ कोई प्रतिरोध नहीं है।भानूसिंहेर पदावली सीधे तौर पर बंगाल के बाउल फकीर बहुजन किसान आदिवासी सामंतवाद विरोधी साम्रजाय्वाद विरोधी आंदोलन को बदनाम गायपट्टी के दैवी सत्ता राजसत्ता विरोधी मनुष्यता के धर्म संत सूफी आंदोलन से जोड़ती है और हम प्रतिरोध की इस जमीन पऱ खड़े होकर भी अपनी ही माटी की ताकत से अनजान खुदकशी का विकल्प चुन रहे हैं।पलाश विश्वास रवींद्र नाथ पर बचपन और किशोर वय में ही उत्तर भारत के कबीरदास और सूरदास के साहित्य का गहरा असर रहा है और संत सूफी साहित्यकारों के अनुकरण में ब्रजभाषा में उन्होंने भानुसिंह के छद्मनाम से बांग्ला लिपि में पदों की रचना की जो गीताजंलि से पहले की उनकी रचनाधर्मिता है  और ऐसा उन्होंने ब्रह्मसमाज और नवजागरण की विरासत के केंद्र बने जोड़ासांकू की ठाकुर बाड़ी में किया।उनकी यह पदावली 1884 में पुस्तकाकार में प्रकाशित हुई है।गाय पट्टी की इस संत सूफी जमीन की खुशब को महसूस करने के लिए भानुसिंह की पदावली पठनीय है लेकिन नेट फर हमें इसका अनुवाद नहीं मिला है। हम रवींद्र की रचनाओं पर फिलहाल फोकस नहीं कर रहे हैं।ऐसा हम बाद में करेंगे।फिलहाल हम इस उपमहादेश की अखंड ऐतिहासिक सांस्कृतिक साहित्यिक विरासत में किसानों,मेहनतकशों के सामंतवाद साम्राज्यवाद और नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के प्रतिरोध की जमीन खोज रहे है जो रवींद्र की रचनाधर्मिता का आधार है तो भारतीय बहुजनों, किसानों और मेहनतकशों क[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-23 संविधान बदलकर मनुस्मृति बहाली के हिंदुत्व के एजंडे के खिलाफ आदिवासी किसानों के प्रतिरोध की विरासत में रवींद्र रचनाधर्मिता! रवींद्र उस भारतवर्ष के प्रतीक है कारपोरेट डिजिटल इंडिया का नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व जिसकी रोज हत्या कर रहा है। ब्रह्म समाज आंदोलन और औपनिवेशिक ब्रिटिश राज से भी पहले पठान मुगल इस्लामी राजकाज के दौरान समाज सुधार आंदोलनों नवजागरण क�

2017-09-13T02:44:33.865-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-23संविधान बदलकर मनुस्मृति बहाली के हिंदुत्व के एजंडे के खिलाफ आदिवासी किसानों के प्रतिरोध की विरासत में रवींद्र रचनाधर्मिता!रवींद्र उस भारतवर्ष के प्रतीक है कारपोरेट डिजिटल इंडिया का नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व जिसकी रोज हत्या कर रहा है।ब्रह्म समाज आंदोलन और औपनिवेशिक ब्रिटिश राज से भी पहले पठान मुगल इस्लामी राजकाज के दौरान समाज सुधार आंदोलनों  नवजागरण की चर्चा खूब होती रही है लेकिन जाति तोड़ो अस्मिता तोड़ो के एकीकरण के बहुजन आंदोलन,आदिवासी किसान जनविद्रोहों के सिलिसिले में बाउल फकीर आंदोलन और लालन फकीर कंगाल हरिनाथ की युगलबंदी के रवींद्र संगीत के दलित विमर्श पर चर्चा कभी नहीं हुई है।बहुजनों के असल नवजागरण के हिंदुत्वकरण के इसी धतकरम से नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व के नस्ली राष्ट्रवाद का जन्म औद्योगिक उत्पादन प्रणाली और ब्रिटिश राज में बहुजनों को मिले हकहकूक की वजह से टूटती जाति व्यवस्था आधारित मनुस्मृति प्रणाली की बहाली के लिए हुआ।इसे समझे बिना नरसंहारी कारपोरेट फासिज्म का प्रतिरोध मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है।पलाश विश्वास कापीराइट मुक्त रवीद्रनाथ अब मुक्त बाजार के आइकन में तब्दील हैं।उनके वाणिज्यिक विपणन से उसी नस्ली वर्ण वर्ग वर्चस्व के राष्ट्रवाद को मजबूत किया जा रहा है जिसका रवींद्रनाथ आजीवन विरोध करते रहे हैं।चर्यापद के बाद आठवीें सदी से लेकर ग्यारवीं सदी के इतिहास में भारत भर में शूद्रों आदिवासियों दलितों के इतिहास पर जिस तरह कोई चर्चा नहीं हुई है,जिस तरह परातत्व अनुसंधान और इतिहास पर वर्ग वर्ण वर्चस्व की वजह से हड़प्पा सिंधु सभ्यता और अनार्य द्रविड[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-22 गोदान की धनिया,सद्गति की झुरिया और रवींद्र की चंडालिका भारतीय स्त्री अस्मिता का यथार्थ! देहमुक्ति के विमर्श में विषमता के रंगभेदी नस्ली विमर्श शामिल नहीं है और इसीलिए बलात्कार सुनामी मुक्तबाजार का धर्म कर्म है।सद्गति का सिलसिला थमा नहीं है।नरसंहार संस्कृति में सद्गति तो मुफ्त उपहार है। महिमामंडन और चरित्रहनन के शिकार रवींद्रनाथ! नोबेल पुरस्कार से प�

2017-09-12T06:55:04.553-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-22गोदान की धनिया,सद्गति की झुरिया और रवींद्र की चंडालिका भारतीय स्त्री अस्मिता का यथार्थ!देहमुक्ति के विमर्श में विषमता के रंगभेदी नस्ली विमर्श शामिल नहीं है और इसीलिए बलात्कार सुनामी मुक्तबाजार का धर्म कर्म है।सद्गति का सिलसिला थमा नहीं है।नरसंहार संस्कृति में सद्गति तो मुफ्त उपहार है।महिमामंडन और चरित्रहनन के शिकार रवींद्रनाथ!नोबेल पुरस्कार से पहले अछूत ब्रह्मसमाजी रवींद्र को बांग्ला भद्रलोक सवर्ण समाज कवि साहित्यकार मानने को तैयार नहीं था तो नोबेल पुरस्कार मिल जाने के बाद उन्होंने  रवींद्र को वैदिकी धर्म और बांग्ला  ब्राह्मणवादी राष्ट्रवाद  का प्रतीक बना डाला।अछूत रवींद्र की जगह जमींदार रवींद्रनाथ ने ले ली और भद्रलोक रवींद्र विमर्श में रवींद्र लंपट जमींदार के सिवाय कुछ नहीं है।पलाश विश्वाससवर्ण भद्रलोक विद्वतजनों ने नोबेल पुरस्कार पाने के बाद से लेकर अबतक रवींद्र के महिमामंडन के बहाने रवींद्र का लगातार चरित्र हनन किया है।रवींद्र साहित्य पर चर्चा अब रवींद्र के प्रेमसंंबंधों तक सीमाबद्ध हो गया है जैसे उनके लिखे साहित्य को वैदिकी धर्म के आध्यात्म और सत्तावर्ग के प्रेम रोमांस के नजरिये से ही देखने समझने का चलन है।कादंबरी देवी,विक्टोरिया ओकैम्पो से लेकर लेडी रानू मुखर्जी तक के साथ प्रेमसंबंधों के किस्सों पर लगातार लिखा जा रहा है।दूसरी तरफ, बहुजनों, मुसलमानों, स्त्रियों, किसानों, मेहनतकशों और अछूतों के लिए उनकी रचनाधर्मिता में समानत और न्याय की गुहार या सत्ता वर्ग वर्ण के नस्ली वर्चस्व के राष्ट्रवाद के खिलाफ उनके प्रतिरोध की चर्चा कहीं [...]



रवींद्र का दलित विमर्श-21 बौद्ध,वैष्णव,बाउल फकीर सूफी आंदोलन की जमीन ही रवींद्र की रचनाधर्मिता और यही लालन फकीर का उन पर सबसे गहरा असर। গীতাঞ্জলির গীতধারায় লালনের দর্শনের বা লালন কালামের পরিশীলিত রচনার ধারাবাহিকতা। कादंबरी की आत्महत्या ने रवींद्र को स्त्री अस्मिता का सबसे बड़ा प्रवक्ता बनाया और क्रूर जमींदार सामंत के पुत्र रवींद्र किसानों, मेहनतकशों, शूद्रों, अछूतों, आदिवास�

2017-09-11T10:06:23.618-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-21बौद्ध,वैष्णव,बाउल फकीर सूफी आंदोलन की जमीन ही रवींद्र की रचनाधर्मिता और यही लालन फकीर का उन पर सबसे गहरा असर।গীতাঞ্জলির গীতধারায় লালনের দর্শনের বা লালন কালামের পরিশীলিত রচনার ধারাবাহিকতা।कादंबरी की आत्महत्या ने रवींद्र को स्त्री अस्मिता का सबसे बड़ा प्रवक्ता बनाया और क्रूर जमींदार सामंत के पुत्र रवींद्र किसानों, मेहनतकशों, शूद्रों, अछूतों, आदिवासियों, मुसलमानों  के हकहकूक के हक में खड़े हो गये।नरसंहार संस्कृति का धर्म और राष्ट्रवाद दोनों कृषि और किसानों के खिलाफ,बोलियों,भाषाओं और संस्कृतियों की साझा विरासत के खिलाफ है।बदनाम हिंदी पट्टी की तुलना में दूसरे गैरहिंदी प्रदेशों में धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद का तांडव,सामाजिक बदलाव की जमीन गायपट्टी में ही प्रतिरोध निरंकुश फासीवाद का प्रतिरोध संभव है।मुक्बाजार में धर्म भी एक अंतहीन पाखंड है जो जाति, वर्ण ,नस्ल के आधार पर वर्ग वर्ण वर्चस्व सुनिश्चित करता है और इसीलिए कारपोरेट एकाधिकार के मुक्तबाजार में धर्मोन्माद का यह नंगा कत्लेआम कार्निवाल है,जिसे राष्ट्रवाद कहा जा रहा है।यह आस्था का नहीं,राजनीति का मामला है,सत्ता समीकरण का मामला है।यही जनसंहार संस्कृति का जायनी तंत्र है तो मनुस्मृति विधान भी।दूध घी की नदियां इसीलिए अब खून की नदियों में तब्दील हैं।पलाश विश्वासपांच अक्तूबर को मैं नई दिल्ली रवाना हो रहा हूं और वहां से गांव बसंतीपुर पहुंचना है।आगे क्या होगा,कह नहीं सकते।कोलकाता में बने रहना मुश्किल हो गया है और कोलकाता छोड़ना उससे मुश्किल तो गांव लौटना शायद सबसे ज्यादा मुश्किल। मैंने जि[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-20 क्या यह देश हत्यारों का है? हम किस देश के वासी हैं? भविष्य के प्रति जबावदेही के बदले घूसखोरी? गौरी लंकेश की हत्या के बाद 25 कन्नड़, द्रविड़ साहित्यकार निशाने पर! मौजूदा सत्ता वर्ग की रिश्वत खाकर भविष्य से दगा करने से इंकार करनेवाले लोग निशाने पर हैं,बाकी किसी को खतरा नहीं है। भारत के किसान हजारों साल से धर्मसत्ता और राजसत्ता के खिलाफ लड़ते रहे हैं।जिसका कोई ब्

2017-09-10T02:32:55.600-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-20क्या यह देश हत्यारों का है? हम किस देश के वासी हैं?भविष्य के प्रति जबावदेही के बदले घूसखोरी?गौरी लंकेश की हत्या के बाद 25 कन्नड़, द्रविड़ साहित्यकार निशाने पर! मौजूदा सत्ता वर्ग की रिश्वत खाकर भविष्य से दगा करने से इंकार करनेवाले लोग निशाने पर हैं,बाकी किसी को खतरा नहीं है।भारत के किसान हजारों साल से धर्मसत्ता और राजसत्ता के खिलाफ लड़ते रहे हैं।जिसका कोई ब्यौरा हमारे इतिहास और साहित्य में नहीं है।अब हम फिर उसी धर्मसत्ता के शिकंजे में हैं और राजसत्ता निरंकुश है।किसान और कृषि विमर्श से बाहर हैं।पलाश विश्वासइंडियन एक्सप्रेस की खबर है।गौरी लंकेश की हत्या के बाद कन्नड़ के 25 साहित्यकारों को जान के खतरे के मद्देनर सुरक्षा दी जा रही है।जाहिर है कि दाभोलकर,पनासरे,कुलबर्गी,रोहित वेमुला,गौरी लंकेश के बाद वध का यह सिलसिला खत्म नहीं होने जा रहा है।हम किस देश के वासी हैं?अब यकीनन राजकपूर की तरह यह गाना मुश्किल हैःहम उस देश के वासी हैं,जहां गंगा बहती है।सत्तर के दशक में हमारे प्रिय कवि नवारुण भट्टाचार्य ने लिखा थाःयह मृत्यु उपत्यका मेरा देश नहीं है।अब वही मृत्यु उपत्यका मेरा देश बन चुका है।शायद अब यह कहना होगा कि मेरा देश हत्यारों का देश है।सत्य,अहिंसा और प्रेम का भारत तीर्थ अब हत्यारों का देश बन चुका है,जिसमें भारतवासी वही है जो हत्यारा है।बाकी कोई भारतवासी हैं ही नहीं।रवींद्रनाथ के लिखे भारतवर्षेर इतिहास की चर्चा हम कर चुके हैं।जिसमें उन्होंने साफ साफ लिखा है कि शासकों के इतिहास में लगता है कि भारतवर्ष हत्यारों को देश है और भारतवासी कहीं हैं ही न[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-19 लालन फकीर का मनेर मानुष गीतांजलि का प्राणेर मानुष। ज्यों-की -त्यों धरि दीन्हीं चदरिया।। संत कबीर को समझे तो रवींद्र और लालन फकीर को भी समझ लेंगे। पलाश विश्वास

2017-09-08T07:41:52.312-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-19लालन फकीर  का मनेर मानुष गीतांजलि का प्राणेर मानुष।ज्यों-की -त्यों धरि दीन्हीं चदरिया।।संत कबीर को समझे तो रवींद्र और लालन फकीर को भी समझ लेंगे।पलाश विश्वासबौद्धमय बंगाल का अवसान ग्यारहवीं शताब्दी में हुआ।आठवीं सदी से लेकर ग्यारहवीं सदी तक बंगाल में बौद्ध पाल राजाओं का शासन रहा जिसका ग्यारहवीं सदी में सेन वंश के अभ्युत्थान के साथ अंत हुआ।सेन वंश के राजा बल्लाल सेन के शासनकाल में बंगाल में ब्राह्मण धर्म का प्रचलन हुआ लेकिन सेन वंश के शासन का अंत तेरहवीं सदी में हो गया।बंगाल में पठान सुल्तानों,हिंदू राजाओं और बारह भुइयां के साथ शूद्र और आदिवासी राजाओं का राजकाज अलग अलग क्षेत्र में चला।बंगाल प्राचीन काल में आर्यों के लिए निषिद्ध रहा है और इसे असुरों का देश माना गया है।From Wikipedia, the free encyclopediaThe history of Bengal includes modern-day Bangladesh and West Bengal in the eastern part of the Indian subcontinent, at the apex of the Bay of Bengal and dominated by the fertile Ganges delta. The advancement of civilization in Bengaldates back four millennia.[1] The region was known to the ancient Greeks and Romans as Gangaridai. The Ganges and the Brahmaputra rivers act as a geographic marker of the region, but also connect it to the broader Indian subcontinent.[2] Bengal, at times, has played an important role in the history of the Indian subcontinet.EtymologyThe exact origin of the word Bangla is unknown, though it is believed to be derived from the Dravidian-speaking tribe Bang/Banga that settled in the area around the year 1000 BCE.[12][13] Other accounts speculate that the name is derived from Venga (Bôngo), which came from the Austric word "Bonga" meaning the Sun-god. According to the Mahabharata, the Puranas and the Harivamsha, Vanga was one of the adopted sons of King Vali who founded the Vanga Kingdom. It was either under Magadh or under Kalinga Rules except few years under Pals.The Muslim accounts refer that "Bong", a son of Hind (son of Hām who was a son of Prophet Noah/Nooh) colonised the area for the first time.[14] The earliest reference to "Vangala" (Bôngal) has been traced in the Nesari plates (805 CE) of Rashtrakuta Govinda III which speak of Dharmapala as the king of Vangala. The records of Rajendra Chola I of the Chola dynasty, who invaded Bengal in the 11th century, speak of Govindachandra as the ruler of Vangaladesa.[15][16][17] Shams-ud-din Ilyas Shah took the title "Shah-e-Bangla" and united the whole region un[...]



रवींद्र दलित विमर्श-18 गौरी लंकेश असुर संस्कृति की अनार्य सभ्यता की द्रविड़ प्रवक्ता थीं,इसीलिए उनका वध हुआ। गांधी,दाभोलकर,पनेसर,कुलबर्गी,रोहित वेमुला के बाद गौरी लंकेश की हत्या फिर मनुस्मृति के स्थाई बंदोबस्त को लागू करने का नस्ली राष्ट्रवाद है,जिसका रवींद्रनाथ विरोध कर रहे थे। संत तुकाराम और चैतन्य महाप्रभु की हत्या कर दी और असहिष्णुता का वही आतंकवाद जारी है। भारत में बुद्ध�

2017-09-07T05:16:48.843-07:00

रवींद्र दलित विमर्श-18गौरी लंकेश असुर संस्कृति की अनार्य सभ्यता की द्रविड़ प्रवक्ता थीं,इसीलिए उनका वध हुआ।गांधी,दाभोलकर,पनेसर,कुलबर्गी,रोहित वेमुला के बाद गौरी लंकेश की हत्या फिर मनुस्मृति के स्थाई बंदोबस्त को लागू करने का नस्ली राष्ट्रवाद है,जिसका रवींद्रनाथ विरोध कर रहे थे।संत तुकाराम और चैतन्य महाप्रभु की हत्या कर दी और असहिष्णुता का वही आतंकवाद जारी है।भारत में बुद्धमय भारत के अवसान के बाद हिंदुत्व पुनरूत्थान की प्रक्रिया महिषासुर वध की निरंतरता है और नस्ली राष्ट्रवाद का प्रतीक वही दुर्गावतार है,जिसकी ताजा शिकार गौरी लंकेश है।किसी मोमबत्ती जुलूस से इस व्यवस्था का अंत नहीं होने वाला है।पलाश विश्वास कल हमने रवींद्र के दलित विमर्श के तहत रवींद्र के दो निबंधों जूता व्यवस्था और आचरण अत्याचार की चर्चा की थी।आचरण अत्याचार में जाति व्यवस्था की अस्पृश्यता पर प्रहार करते हुए रवींद्र ने लिखा है कि गाय मारने पर प्रायश्चित्त का विधान है लेकिन मनुष्य को मारने पर सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है , उसी तरह अछूतों को छूने पर जाति चली जाती है लेकिन अछूतों पर अत्याचार,उत्पीड़न और उनकी बेदखली से जाति मजबूत हो जाती है।गोरक्षकों के तांडव में प्रायश्चित्त का विधान अब वध है।जिस सामाजिक यथार्थ की बात रवींद्र ने उन्नीसवीं सदी में कही थी,वह आजादी के सत्तर साल बाद नरसंहार संस्कृति का नस्ली राष्ट्रवाद है।गोरक्षकों के तांडव पर हिंदू गांधी के पोते की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला बताता है कि कानून का राज और संविधान कितना बेमायने है और कानून व्यवस्[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-सत्रह नस्ली वर्चस्व का परमाणु राष्ट्रवाद अब हाइड्रोजन बम है महात्मा फूले की गुलामगिरि और रवींद्र नाथ के जूता व्यवस्था का आंतरिक उपनिवेशवाद का सामाजिक यथार्थ एक है गोहत्या पर सजा और मनुष्य की हत्या पर बिना प्रायश्चित्त सामाजिक प्रतिष्ठा के हिंदुत्व पर रवींद्रनाथ का प्रहार राष्ट्रीयताओं की विविधता बहुलता के लोकतांत्रिक ढांचा में ही देश बचता है और निरं�

2017-09-05T02:18:47.159-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-सत्रहनस्ली वर्चस्व का परमाणु राष्ट्रवाद अब हाइड्रोजन बम हैमहात्मा फूले की गुलामगिरि  और रवींद्र नाथ के जूता व्यवस्था का आंतरिक उपनिवेशवाद का सामाजिक यथार्थ एक हैगोहत्या पर सजा और मनुष्य की हत्या पर बिना प्रायश्चित्त सामाजिक प्रतिष्ठा के हिंदुत्व पर रवींद्रनाथ का प्रहारराष्ट्रीयताओं की विविधता बहुलता के लोकतांत्रिक ढांचा में ही देश बचता है और निरंकुश वर्चस्व की सत्ता देश तोड़ती हैपलाश विश्वास नस्ली वर्चस्व के फासीवादी नाजी निरंकुश राष्ट्रवाद पश्चिम से और खासतौर पर यूरोप के साम्राज्यवादी राष्ट्रों से आयातित सबसे खतरनाक हाइड्रोजन बम है।फासीवादी अंध राष्ट्रवाद की कीमत  जापान को हिरोसिमा और नागासाकी के परमाणु विध्वंस से चुकानी पड़ी है।रवींद्र नाथ ने जापान यात्रा के दौरान इस अंध राष्ट्रवाद के खिलाफ जापानियों को चेतावनी दी थी।हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिरने से पहले 1941 में ही रवींद्रनाथ दिवंगत हो गये लेकिन उनकी वह चेतावनी अब हाइड्रोजन बम की शक्ल में विभाजित कोरिया के साथ साथ परमाणु साम्राज्यवाद के रचनाकार महाबलि अमेरिका के लिए अस्तित्व संकट बन गया है। इसी अंध राष्ट्रवाद के कारण दो दो विश्वयुद्ध हारने वाले जर्मनी का विभाजन हुआ लेकिन फासीवाद और नवनाजियों के प्रतिरोध में कामयाबी के बाद बर्लिन की दीवारे ढह गयीं और जर्मनी फिर अखंड जर्मनी है जो बार बार नवनाजियों का प्रतिरोध जनता की पूरी ताकत के साथ कर रहे हैं।कोरिया खुद जापानी साम्राज्यवाद का गुलाम रहा है और साम्राज्यवाद के हाथों खिलौना [...]



रवींद्र का दलित विमर्श-16 आंतरिक उपनिवेश में नस्ली नरसंहार के प्रतिरोध में आदिवासी अस्मिता के झरखंड आंदोलन के दस्तावेजों का अनिवार्य पाठ भारतमाता का दुर्गावतार नस्ली मनुस्मृति राष्ट्रवाद का प्रतीक है तो महिषासुर वध आदिवासी भूगोल का सच দুই ছিল মোর ভুঁই, আর সবই গেছে ঋণে। বাবু বলিলেন, 'বুঝেছ উপেন? এ জমি লইব কিনে।' কহিলাম আমি, 'তুমি ভূস্বামী, ভূমির অন্ত নাই - চেয়ে দেখো মোর আছে বড়জোর ম�

2017-09-03T02:27:48.715-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-16आंतरिक उपनिवेश में नस्ली नरसंहार के प्रतिरोध में आदिवासी अस्मिता के झरखंड आंदोलन के दस्तावेजों का अनिवार्य पाठभारतमाता का दुर्गावतार नस्ली मनुस्मृति राष्ट्रवाद का प्रतीक है तो महिषासुर वध आदिवासी भूगोल का सचদুই ছিল মোর ভুঁই, আর সবই গেছে ঋণে। বাবু বলিলেন, 'বুঝেছ উপেন? এ জমি লইব কিনে।' কহিলাম আমি, 'তুমি ভূস্বামী, ভূমির অন্ত নাই - চেয়ে দেখো মোর আছে বড়জোর মরিবার মতো ঠাঁই। শুনি রাজা কহে, 'বাপু, জানো তো হে, করেছি বাগানখানা, পেলে দুই বিঘে প্রস্থে ও দিঘে সমান হইবে টানা - ওটা দিতে হবে।'पलाश विश्वास দুই ছিল মোর ভুঁই, আর সবই গেছে ঋণে। বাবু বলিলেন, 'বুঝেছ উপেন? এ জমি লইব কিনে।' কহিলাম আমি, 'তুমি ভূস্বামী, ভূমির অন্ত নাই - চেয়ে দেখো মোর আছে বড়জোর মরিবার মতো ঠাঁই। শুনি রাজা কহে, 'বাপু, জানো তো হে, করেছি বাগানখানা, পেলে দুই বিঘে প্রস্থে ও দিঘে সমান হইবে টানা - ওটা দিতে হবে।'   (दो बीघा जमीन ही बची है मेरी,बाकी सारी जमीन हुई कर्ज के हवाले।बाबू बोले,समझे उपेन?उसे मेरे हवाले करना होगा।यह जमीन मैं खरीद लुंगा।मैने कहा,तुम हो भूस्वामी,तुम्हारी भूमि का अंत नहीं।मुझे देखो,मेरी मौत के बाद शरण के लिए इतनी ही जमीन बची है।सुनकर राजा बोले-बापू,जानते हो ना,बागान तैयार किया है मैंने,तुम्हारी दो बिघा जमीन शामिल कर लूं तो लंबाई चौड़ाई में होगा बराबर,उसे देना होगा।) राष्ट्रीयताओं के दमन और आदिवासी भगोल में अनंत बेदखली अभियान और भारतीय किसानों की अपनी जमीन छिन जाने के बारे में रवींद्र नाथ की लिखी कविता दो बिघा जमीन आज भी मुक्त[...]



रवींद्र का दलित विमर्श-15 मैं अछूत हूं,मुझे मंत्र का अधिकार नहीं है मैं अछूत हूं,मेरी कोई जाति नहीं है!.. सभ्यता का संकटःफर्जी तानाशाह बहुजन नायक नायिकाओं का सृजन और विसर्जन मनुस्मृति राजनीति का सोशल इंजीनियरिंग है। भारत विभाजन के बाद बहुजनों की आस्था,उनके धर्म और उनके राजनीतिक स्वायत्तता के इन आंदोलनों को बाबा बाबियों के तानाशाह रंगीला दूल्हा दुल्हनों के हवाले करने की कारपोरेट �

2017-09-01T02:22:10.851-07:00

रवींद्र का दलित विमर्श-15मैं अछूत हूं,मुझे मंत्र का अधिकार नहीं है मैं अछूत हूं,मेरी कोई जाति नहीं है!..सभ्यता का संकटःफर्जी तानाशाह  बहुजन नायक नायिकाओं का सृजन और विसर्जन मनुस्मृति  राजनीति का सोशल इंजीनियरिंग है।भारत विभाजन के बाद बहुजनों की आस्था,उनके धर्म और उनके राजनीतिक स्वायत्तता के इन आंदोलनों को बाबा बाबियों के तानाशाह रंगीला दूल्हा दुल्हनों के हवाले करने की कारपोरेट सत्ता के ब्राह्मणतांत्रिक सत्ता राजनीति का हाथ रहा है। जिससे इन आंदोलनों के मार्फत दलितों,पिछड़ों,आदिवासियों और अल्पसंख्यक समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नियंत्रण में रखकर मनुस्मृति राज बहाल किया जाये और बहुजनों के सामुदायिक जीवन और साझा संस्कृति की विरासत और उनके मनुष्यता के धर्म का हिंदुत्वकरण कर दिया जाये।पलाश विश्वास बंगाल के नबाव के दरबारी दो पूर्वज गोमांस की गंध सूंघने का आरोप में मुसलमान बना दिये गये थे तो रवींद्र के पूर्वज अछूत पीराली ब्राह्मण बन गये थे। नोबेल पुरस्कार मिलने से पहले सामाजिक बहिस्कार की वजह से अपने बचपन की अस्पृश्यता यंत्रणा पर उन्होंने कोई दलित आत्मकथा नहीं लिखी लेकिन उनकी स्मृतियों में इस अस्पृश्यता का दंश है।नोबेल पुरस्कार पाने के बावजूद हिंदुत्व के पवित्र धर्मस्थलों में उनका प्रवेशाधिकार निषिद्ध रहा है।ब्रहामसमाजी टैगोर परिवार  जमींदारी और कारोबार के तहत कोलकाता में प्रतिष्ठित थे लेकिन भद्रलोक समाज से बहिस्कृत थे।गीताजंलि में इसीलिए उनका अंतरतम लालन फकीर का मनेर मानुष और उनका प्र[...]



रवींद्र दलित विमर्शः14 रक्तकरबी(Red Oleanders)- राष्ट्रवाद वहीं है जो कुलीन सवर्ण सत्ता वर्ग का हित है। राष्ट्र मेहनतकश अवर्ण बहुजन बहुसंख्य जनगण की निगरानी,उनके,दमन,उत्पीड़न सफाये, नागरिकता नागरिक और मानवाधिकार हनन का सैन्य तंत्र है। इस हिंदू राष्ट्र के रामराज्य में किसी नंदिनी की आवाज की कोई गूंज नहीं है न लावारिश खून का कोई नामोनिशां है और न कातिल का कोई सुराग। मनुष्यता का वजूद आधार न�

2017-08-31T01:40:53.065-07:00

रवींद्र दलित विमर्शः14रक्तकरबी(Red Oleanders)- राष्ट्रवाद वहीं है जो कुलीन सवर्ण सत्ता वर्ग का हित है। राष्ट्र मेहनतकश अवर्ण बहुजन बहुसंख्य जनगण की निगरानी,उनके,दमन,उत्पीड़न सफाये, नागरिकता नागरिक और मानवाधिकार हनन का सैन्य तंत्र है।इस हिंदू राष्ट्र के रामराज्य में किसी नंदिनी की आवाज की कोई गूंज नहीं है न लावारिश खून का कोई नामोनिशां है और न कातिल का कोई सुराग। मनुष्यता का वजूद आधार नंबर है और आधार नंबर नहीं है तो आपका कोई वजूद नहीं है।बुनियादी सेवाओं और जरुरतों,नागरिक और मानवाधिकार से आप वंचित है।इस अंधियारे के तिलिस्म में अभिव्यक्ति कैद है और नागरिकों की चौबीसों घंटे निगरानी है।निजता और गोपनीयता  के अधिकार की क्या कहिये, संवैधानिक अधिकार,मौलिक अधिकार,नागरिकता और नागरिक मानवाधिकार के हनन का अंध राष्ट्रवाद नरसंहारी सुनामी है,जिसके खिलाफ जन प्रतिरोध संगठित करने वाला यक्षपुरी का कोई अध्यापक कहीं नहीं है।नंदिनी का चरित्र जी रही तृप्ति मित्र के अवसान के बाद नंदिनी की आवाज की कोई गूंज बची नहीं है और  न बचा है शंभू मित्र का वह रंगकर्म।पलाश विश्वास मुझे नेट पर हिंदी में रक्तकरबी से संबंधित कोई समाग्री नहीं मिली है।अगर किसी के पास संबंधित सामग्री की जानकारी है तो कृपया शेयर करें।कोलकाता से नई दिल्ली पहुंचे फिल्मकार राजीव कुमार और उनकी पत्नी मीनाभाभी कई दिनों से कोलकाता में अपने पुराने घर में हैं और आज शाम फिर नई दिल्ली वापस हो जायेंगे।राजीव हमारे डीएसबी नैनीताल जमाने के मित्र हैं।कल का दिन उनके नाम रहा।[...]