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एक  कर  का  की  के  तुम  नहीं  पर  में  वही  से  ही  है  हो 
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मानसी





Updated: 2018-02-07T17:16:51.586-05:00

 



माँ तुम प्रथम बनी गुरु मेरी

2017-11-29T20:57:30.771-05:00

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उस्ताद शाहिद परवेज जी "सांस्कृतिक सफ़र मानोशी के साथ में"

2017-11-08T18:56:52.396-05:00

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बंधन

2017-06-05T21:42:27.942-04:00

बंधन बहुत मीठा होता है, अधिकार बहुत सुंदर| प्यार में दोनों साथ-साथ चलते हैं, रुक कर एक दूसरे को सहलाते हैं, हँसते हैं, खिलखिलाते हैं, गम में संग मुस्कराते है....और एक दिन जब प्यार बन जाता है नियंत्रण, अधिकार बदल जाता है स्वामीत्व में, कसते-कसते, बंधन बनने लगता है फंदा, तब खुशी बन जाती है  घुटन, हँसी एक दबी चीख, मु्स्कान बेड़ी, और जीवन...एक दंड...















नया अल्बम A Journey- सफ़र

2017-05-24T22:23:15.536-04:00

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मुहब्बत

2017-02-18T20:59:32.872-05:00

मुझे इस ख़याल से मुहब्बत है
कि तुम्हें मुहब्बत है मुझसे।

ख़यालों की दीवानगी
में भटकती हूँ ,
किसी कहानी के किवाड़ के पीछे
छुप जाती है हक़ीक़त,
मेरी तन्हाई पे गिरती है बिजली ,
रूह चौंकती है,
पोर-पोर में बसे मिलते हो तुम,
सराबोर तुमसे मैं
तीर बन जाना चाहती हूँ,
उस पागलपन के चक्रव्यूह से निकल
किसी बादल पर जा कर अड़ जाना
चाहती हूँ ,
जो झमाझम बरस पड़े
तो भीग जाए तुम्हारा तन, मन, रूह
उस कठिन धरती पे बो आऊँ एक बीज
कल जो पौधा बने तो उस की छांव मेरी हो,
मुझे उस छांव से मुहब्बत है कि
तुम रोपोगे वह छांव
मुझे उस खयाल से मुहब्बत है कि
तुम हक़ीक़त हो मेरी,
मुझे मुहब्बत है तुमसे...

--मानोशी



माँ सुनो...

2017-01-10T22:44:19.254-05:00


माँ सुनो,
आँखों में अब परी नहीं आती,
तुम्हारी थपकी नींद से कोसों दूर है,
आज भूख भी कैसी अनमनी सी है
तुम्हारी पुकार की आशा में,
"मुनिया...खाना खा ले"
माँ सुनो,
मैं बड़ी नहीं होना चाहती थी,
तुम्हारी छोटी उंगली से लिपटी
रहना चाहती थी,
छोटी बन कर ।
याद है माँ?
मैं माँ बनना चाहती थी?
'तुम' बनना चाहती थी?
बालों में तौलिया लगा कर?
बड़ी बिंदी में आईने से कितनी बातें की थीं...
सुनो माँ,
एक और बचपन उधार दोगी ?
बड़े जतन से
धो-पोंछ कर रखूँगी,
और जब बड़ी हो जाऊंगी,
बचपन-बचपन खेलूंगी
मैं, तुम बन कर..
माँ, 'तुम' ही तो हूँ न मैं?
तुम नहीं हो तो क्या...
मानोशी



गीत में अब मैं तुम्हें लिख नहीं पाती

2017-01-03T23:17:58.315-05:00

गीत में अब मैं तुम्हें लिख नहीं पाती।शब्द जैसे पंखुड़ी बन झर गये हैं,भावनाओं के भ्रमर भी मर गए हैं,छंद औ' गीतों में छिड़ता द्वन्द कोई बंद सारे इधर-उधर बिखर गए हैं,ये अधूरी कथायें अब नहीं गाती। दूर तक किस शून्य को मैं देखती हूँ,मन-तरंगों से संदेसा भेजती हूँ, क्यों जगत के सामने मैं प्रेम रोऊँ?अश्रु-जल इस व्यथित हृदय सहेजती हूँ,मूर्ति जो मन में बसी वह नहीं जाती। दिन गुज़रता ज्यों बड़ी चट्टान कोईनहीं दिखता दूर तक अवसान कोई गहन वेदना शूल बन कर संग रहती बन रही मेरी यही पहचान कोई समय की यह सुई तो थम नहीं पाती...--मानोशी [...]



जब कभी मैं कह न पाऊँ ....

2016-09-30T21:22:27.296-04:00


जब कभी मैं कह न पाऊँ...और अगर तुम सुन सको...

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A Journey - सफ़र- सुनिए एक गीत के अंश

2016-08-22T00:05:34.558-04:00

मेरे आने  वाले  एल्बम "A Journey सफ़र" से एक  ट्रैक का अंश सुनने के लिए नीचे के लिंक पर क्लिक करें - 






सफ़र - A Journey

2016-08-17T23:34:08.979-04:00

बड़ों के आशीर्वाद और दोस्तों की दुआओं का कारण है कि मेरे गीतों का यह अल्बम आप सब के समक्ष जल्द ही होगा| "सफ़र" के नाम से जल्द ही रिलीज़ होने वाला यह एल्बम एक जीवन का सफ़र है...अल्हड़ता, प्रेम, विरह, जीवन और जीवन की प्राप्ति तक का सफ़र - इसीलिए इस एल्बम का नाम है - " A Journey" या सफ़र | गीत और संगीत की कोशिश मेरी अपनी है और संगीत अरेंजमेंट किया है सुरजीत दास जी ने|  आशा है रिलीज़ होने पर आप सब को यह एल्बम पसंद आयेगा और इस के शब्द व संगीत  सब के दिलों तक पहुंचेंगे| 

अभी कवर की तसवीरें - 



खिल रही खिल-खिल हँसी

2016-10-02T10:16:46.430-04:00

खिल रही खिल-खिल हँसीजीवन हुआ फूलों भरा,शाम कोई ढल रही हैविहँसती है नवधरा |  अंकुरित से स्वप्न थे जो नींद से अब जग रहे, राह पथरीली रही निश्चय सदैव अडिग रहे,बहुत थी दुश्वारियाँ  आसान कुछ भी था नहीं, थे फफोले पाँव में परस्थिर हमारे पग रहे, बादलों के ओट से जो झाँकती है रोशनी, खुल रहा मौसम चलो अब  छंट रहा है कोहरा | मैं चली निर्बाध गतिजिस ओर नदिया ले चली,  नाव काग़ज़ की रही पर दूर तक खेती चली,था किनारा ही नहीं कोईक्षितिज के छोर तक,सुनहरी आभा लुभातीस्वयं के माया छली,काट कर सब रेशमी जालेछलावे तोड़ कर, एक निश्चित ठौर ढूँढेअब कहीं मन बावरा |साँझ ढलती है मगर इक अजब सा अहसास है, छूटता है वो कभी जो दूर था पर पास है, कुछ हृदय में मच रही हलचल कहीं इक दर्द है, पर सवेरा धवल होगायह बड़ा विश्वास है,भूल पाना भी विगत को कब सहज होता मगर‘गर कदम हों दृढ़, सुना है, समय देता आसरा |  --मानोशी [...]



देवदार के पेड़

2016-05-27T18:39:16.608-04:00

(image)

शीश झुका कर ज्यों रोये हैं
देवदार के पेड़
बादल के घर ताक-झाँक
करने की उनको डाँट पड़ी है 
भरी हुई पानी की मटकी
सर से टकरा फूट पड़ी है
सूरज भी तो क्षुब्ध हुआ है
उसका रस्ता रुद्ध हुआ है
दिन भर चिंता में खोये हैं
देवदार के पेड़
थका हुआ सा दिन ले आया
कुहरे का इक बड़ा पिटारा
उसके पीछे फँसा पड़ा था
दल से बिछड़ा हुआ सितारा
टहनी-टहनी कुहरा छाँटे
आपस में संदेशा बाँटे
सारी रात नहीं सोये हैं
देवदार के पेड़
नई सुबह अब बाण सुनहरे
चला रही है आड़े-तिरछे
बादल भी अब संभले हैं कुछ
शांत हुए हैं इस के पीछे
गीले तन को पोंछ तने हैं
नए रूप में सजल बने हैं
किरणों की क्यारी बोये हैं
देवदार के पेड़

Manoshi



तब और आज

2016-03-22T07:42:42.915-04:00


तुम्हारा खिलखिलाना
हँसते रहना,
बात-बात पर
मेरी बातों का
भँवर सा जवाब देकर 
शरारत से यूँ देखना कि
मैं उस भँवर में डूब जाता,
एक मिनट की गंभीर चुप्पी
के बाद खुद ही को टटोल कर
हँस पड़ता,
और तुम्हारी आँखों की शरारत
दुगुनी हो जाती,
जैसे कुछ पा लिया हो तुमने
और मेरी इच्छा होती,
कि खींच लूँ तुम्हें ,
एक हल्की चपत लगा दूँ गालों पर
और प्यार से भर लूँ बाँहों में
पर कर नहीं पाया कभी,
...
आज तुम चुप हो
आज मैं तोड़ नहीं पा रहा तुम्हारी चुप्पी
आज भी मन है
कि भर लूँ तुम्हें बाँहों में
खींच लूँ अपने पास,
पर कर नहीं पाता
फर्क बस इतना है कि
तब तुम मेरे पास थी बहुत
आज, बहुत दूर हो कहीं...
----मानोशी



प्यार और पागलपन

2016-03-20T20:43:31.985-04:00

तुम कहते  हो
तुम ऐसी क्यों हो?
कोई तुम सा नहीं,
कोई पागल न हो जो तुम्हारे साथ रहे...?
अब सच  यकीं होने लगा है मुझे, 
इतनी दूरी में भी पास का अहसास कर लेना
बातो से ही मन बहला लेना
और एक दिन अचानक खोने के डर से 
सब तोड़ देना,
मेरा पागलपन,
तुम्हारा प्यार,
कुछ एक जैसा ही तो है. 







जीवन कथा

2016-02-06T11:54:01.665-05:00

नए भवन मेंनई गृहस्थी,डाल-डाल पर तितली तितली.कली-हृदय कुछ अस्फुट सा है,स्वप्न,  नींद में अंकुर सा है,लगता जग सुन्दर निष्पापीहृदय बड़ा सागर जैसा है,चंचल मन मेंकितने सपने,  जीवन खट्टी मीठी इमली.आँगन में चन्दा उतरेगा,हँसकर मेरी गोद छुपेगा,तारो की लोरी सुनकर मनधीरे-धीरे झूम उठेगा,नाचेगा जीवननन्हें हाथो की डोरीबन कठपुतली.खुशियों के ज्यों कलरव उठतेनीड़ चहकते सुबह सवेरे,जीवन की आपाधापी फिर  कम हो जाती धीरे-धीरे,रह जाता खाली आँगन,  ज्योंछुप जातीबादल में बिजली.---मानोशी [...]



कैसे कह दूँ आंखों में अब बाकी कोई स्वप्न नहीं है ।

2016-01-05T20:09:37.253-05:00

कैसे कह दूँ आंखों में अब बाकी कोई स्वप्न नहीं है ।जब आँधी ने ज़ोर पकड़ लीतब भी हार नहीं मानी थी,बारिश, तूफ़ां, रात घनेरीसब से लड़ने की ठानी थी,ध्वस्त किले में बना खंडहरसो रहा है , मगर अभी भीसुंदर किस्से बांच रहा है थका नहीं है स्वप्न कभी भी मिली नहीं हो जीवन भर की खुशियाँ लेकिन बिखरी-बिखरीइधर-उधर मिल जायेंगी टुकड़ों में, साथी, ढूँढ! यहीं हैं...यूँ तो जीवन बीत गया पर अभी अधूरा सा लगता है,क्या पाया क्या खोया बस यहगिनने मे ही दिन कटता है आंखें आंसू से धोती जबमेरे दुख के मुर्झाये पलबच्चों की किलकारी से खिलउठता आंखों में पलता कलशाम ढले फिर हो जाता है दिल बोझिल पत्थर सा कोईवो जो छूट गया पीछे फिर मिलता क्या अब दोस्त कहीं है?कैसे कह दूँ आंखों में अब बाकी कोई स्वप्न नहीं है...Manoshi[...]



लौट पाते पर कहीं यदि पल पुराने...

2016-01-05T20:03:59.719-05:00


बहुत सुंदर है हमारा कल यकीनन,
लौट पाते पर कहीं यदि पल पुराने ।

संग में जो चित्र खींचे
हो रहे साकार अब पर, 
रंग सारे घुल गये हैं
वक्त के उस कैन्वस पर।
तूलिका इक हाथ ले कर
साथ में जो बुने सपने,
दीर्घ रजनी में गुमे हैं
शेष इक आभास है भर ।

अब उसी आभास को हम
चलो छू लें,
संग में अब चलो जी लें,
कल सुहाने ।

आज भी कुछ ख़्वाब मेरे
रखे सिरहाने तुम्हारे
जागते हैं रात भर
पर लुप्त हो जाते सेवेरे,
स्पर्श इक पल का तुम्हारा
दौड़ता है हर शिरा मे,
गंध की अनुभूति कोई
समा जाती बहुत गहरे,
एक भीनी हवा छू कर गई
जैसे,
बदलती जीवन-कथा के
सभी माने।

घेरता था बढ़ अंधेरा
जब अचानक हर तरफ़ से,
दूर कोई रोशनी तब
इक अजाना पथ दिखाती
आस की डोरी इशारों
ने तुम्हारे बाँध दी तो
कभी मेरी क्षणिक आशा
फिर तुम्हें चलना सिखाती,
चांद तक का हो सफ़र
अब पूर्ण शायद,
मिले शायद ख्वाब को भी
अब ठिकाने।

--मानोशी 



दुर्गा पूजा पर

2015-10-25T21:09:38.020-04:00

माँ का फिर आह्वान हुआ है जगत उल्लसित पुलक उठा।शरत-प्रात की धवल धूप में ठण्ड गुलाबी नहा रहीकास फूल की लहर चली हैहवा हर्ष की बहा रही लाल पाड़ की घूँघट ओढ़े दीपक थाली हाथ लियेपूजा को जब चली सुहागिनहर दिक् चंदन महक उठा।शंख नाद के साथ उलू ध्वनि थाप ढाक की मतवारीबच्चों के दल के कलरव सेविहँस उठीं गलियाँ सारीप्रतिमायें सज उठीं मनोरमपंडालों से सजे शहरआलोकित जग मन उत्साहितहृदयांचल भी दमक उठा।पुष्पांजलि संग मंत्रोचारणरंग अल्पना के निखरेमहिषासुर मर्दिनी पधारोआवाहन के स्वर बिखरेहे दुर्गे, हे दुर्गतिनाशिनिजग अँधियारा दूर करोमाँ के श्री चरणों में आकर अश्रु दृगों में छलक उठा।- मानोशी चटर्जी   १५ अक्तूबर २०१५http://www.anubhuti-hindi.org/sankalan/mamtamayi/2015/geet/manoshi_chatterjee.htm[...]



क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन

2016-06-22T20:41:08.160-04:00

अनगिन तारो में इक तारा ढूँढ रहा है,क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन।छोटा सा सुख मुट्ठी से गिरफिसल गया,खुशियों का दलहाथ हिलाता निकल गयाभागे गिरते-पड़ते पीछे,मगर हाथ में आया जो सपना वो फिर सेबदल गया,सबसे अच्छा चुनने में उलझा ये जीवन।क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन।सबकी देखा-देखी में मैं भी इतराया,मिला नहीं कुछ मगर ह्रदयक्षण को भरमाया,आसमान को छू लेने के पागलपन में,अपनी मिट्टी का टुकड़ा बेकार गँवाया,सीधा सादा जीवन रस्ते कांकर बोये,फूलों के मधुरस में भी पाया कड़वापन।क्या खोया क्या पाया बैठा सोच रहा मन।--Manoshi[...]



एक विनम्र प्रयास - किया है प्यार जिसे

2015-09-29T19:59:37.676-04:00

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जीवन बस अपना होता है

2015-08-06T12:42:32.463-04:00

जीवन बस अपना होता है,अपने ही सँग जीना सीखो॥जब-जब आशा के पौधोँ कोसींचा मैँने बडे जतन सेफूल खिलेँगे, मोती देँगे,सपना बोया बहुत लगन से,माली ने निष्ठुरता से यूँअधखिलती कलियों को काटारँगहीन था रक्त बहा जोलेकिन क्या परवाह किसी को॥जीवन बस अपना होता है,अपने ही सँग जीना सीखो॥नई-पुरानी छोटी-छोटीबूँदों से कुछ बादल जोडे,कहीं सितारा, कहीं चँद्रमा,झिलमिल रातें, सपने काढे,सोचा छू लूँ, पँख लगा कर,ऐसी आँधी चली अचानकसावन बरसा पर तरसा करफिर से प्यासा रखा नदी को॥जीवन बस अपना होता है,अपने ही सँग जीना सीखो॥हम हैं जो बुनते अनदेखेसब आशंकाओं के जाले,हम ही होते शत्रु स्वयं केअपने से ही चलते चालें,तेज़ धार में समझबूझ करदे देते पतवार नाव की,गहरे जल के हिचकोलों मेंदोषी ठहराते माझी को॥ जीवन बस अपना होता है,अपने ही सँग जीना सीखो॥[...]



गुरु पूर्णिमा पर - माँ तुम प्रथम गुरु बनी मेरी...

2015-08-04T18:41:57.763-04:00

मां तुम प्रथम बनी गुरु मेरीतुम बिन जीवन ही क्या होतासूखा मरुथल, रात घनेरीप्रथम निवाला हाथ तुम्हारेपहली निंदिया छाँव तुम्हारेपहला पग भी उंगली थामेचला भूमि पर उसी सहारेबिन मां के है सब जग सूनाजैसे गुरु बिन राह अंधेरीजिह्वा पर भी प्रथम मंत्र काउच्चारण तो मां ही होताशिशु हो, युवा, वृद्ध हो चाहे दुख में मां की सिसकी रोताद्वार बंद हो जाएँ सारे माँ के द्वार न होती देरीमां की पूजा विधि विधान क्याफूल न चंदन, मंत्र सरल साप्रेम पुष्प अँजुरी में भर कर गुरु के चरणों अर्पित कर जाआशीषों की वर्षा ऐसी बजे गगन में मंगल भेरीमां तुम प्रथम बनी गुरु मेरी--Manoshi[...]



वही तुम...

2015-08-04T18:44:00.660-04:00

आज फिर एक सफ़र में हूँ...आज फिर किसी मंज़िल की तलाश में,किसी का पता ढूँढने निकला हूँ,आज फिर...सब कुछ वही है...वही सुस्त रास्तेजो भोर की लालिमा के साथ रंग बदलते हैं,वही भीड़जो धीरे-धीरे व्यस्त होते रास्तों के साथव्यस्त हो जाती है,वही लाल बत्तियाँ जो घंटों इंतज़ार करवाती हैं,वही पीली गाड़ियाँजो रुक-रुक कर चलती हैं, कभी हवा से बात करती हैं,तो कभी साथ चलती अपनी सहेलियों से कानाफ़ूसी,उन्हीं में से एक में बैठा मैं,वही...वही पीछे की ख़ाली सीट,और वही मेरा दायाँ हाथ सीट परकिसी हाथ को अनजाने ही ढूँढता सा...रास्ते भर ढूँढती हैं आँखेंवही पावभाजी वाला ठेला,उस काले बड़े तवे पर सब्ज़ियों के साथतुम्हारी आँखों के आश्चर्य का मिश्रण,और वही आइस्क्रीम... डेयरी मिल्क वाली,मगर आज बँधा है पालीथीन का एक ही बैग...है सब वही,मगर आज बस एक ही चम्मच,छोटी सी, वही...लकड़ी की...पर बस एक...वही तुड़ा-मुड़ा आसमां आज भी...शायद आज भी बरस पड़े कोई बादल फट कर,फिर शायद बनें रास्ते में कोई पोखरजहाँ मिल जाये एक तैरती कागज़ की नाव,वह छोटा सा मंदिर,जो अचानक ही मिल गया थाखुले बरसते बादलों के नीचे,वही शिवलिंग और हमारा साथ-साथ हाथ जोड़ना...तुम्हारी श्रद्धा... और मेरा तुम्हारा मन रखना...आज मैं अकेले खड़ा हूँ, बिना हाथ जोड़े...वह लंबी सड़क, सड़क के पास बड़ी सी पानी की खाल,वही हवा,वही धूप,वही खुश्बू,हर जगह वही सब कुछ।बस नहीं हो, तो तुम...पर हो तो...तुम वही...मेरे साथ हो तुम...वही तुम...Manoshi[...]



मां तेरी यादों के आगे

2015-07-23T14:41:44.919-04:00

मां तेरी यादों के आगेजग के सारे बंधन झूठे|जिस उँगली को हाथों थामेजीवन पथ पर चलना सीखा,प्राण ऋणी हैं, जिस अमृत केउस अमृत बिन जीवन फीका,याद नहीं करने को कहतेबंधु- बांधव, हित में मेरे,किन्तु भूलकर हर्ष मनाऊँ इस से अच्छा जीवन छूटे।बहुत कठिन है सूखे मरुथलमें पानी बिन प्यासे चलना,मरीचिका से आस लगायेअपने को ही खुद से छलना, मेरा हृदय बना है तेरी स्मृतियों से सज्जित इक आंगन,जैसे चौबारा तुलसी का पूजा का यह क्रम ना टूटेमां तेरी यादों के आगेजग के सारे बंधन झूठे।-- मानोशी[...]



मां - तुम्हारे जाने के बाद

2018-01-13T00:54:05.159-05:00

गीत फिर मैं लिख रही हूँदर्द का सागर दबाये,जो लहू बहता नसों मेंआँख से अब बह न जाये।जो सुरों का स्रोत मेरा,ज्योति बन कर जल रहा जो,उंगलियो के पोर तक मेंहर शिरा में पल रहा जो,व्यर्थ क्यों आंसू बहाऊँजब बसा वह अंग मेरे,गहन अंतर में छुपा हैचल रहा है संग मेरे,जीव बन कर ना रहा परआत्मा मुझ में समाये।लग रहा है प्राण मेरेनोक पर जैसे टिके हैं,जगत में उसके सिवा सबस्वार्थ के हाथों बिके है,हर इक पग पर याद तेरीश्वास क्रम में बस रही है,समय जैसे जा रहा हैडोर स्मृति की कस रही है,किस तरह से धूप में शिशुछांव बिन जीवन बिताये।जो लहू बहता नसों मेंआंख से अब बह न जाये।[...]